प्रबंधन एवं परसेप्शन का चुनाव है दिल्ली

राजेन्द्र द्विवेदी, जनवरी 2025 में होने जा रहे दिल्ली का चुनाव भाजपा और आप के प्रबंधन और परसेप्शन के बीच होने जा रहा है। 10 वर्ष से अधिक समय से केजरीवाल दिल्ली में और भाजपा केंद्र में सत्ता में है। केजरीवाल को स्थापित करने में भाजपा के अनुषांगिक संगठनों का भी महत्वपूर्ण योगदान है। 2013 में मनमोहन सरकार के खिलाफ जो जन आंदोलन हुआ था उसमें मुखौटा अन्ना हजारे तथा भाजपा के अनुषांगिक संगठन और सिविल सोसाइटी की प्रमुख भूमिका थी। यह माना जा रहा है कि इस आंदोलन का दिल्ली के 2013 विधानसभा चुनाव में केजरीवाल को सियासत में स्थापित कर दिया। नवगठित पार्टी आप को पहली बार 2013 चुनाव में 28 सीटें और 30% वोट मिल जबकि भाजपा को 31 सीट और 33% वोट मिले। 15 वर्षों तक लगातार मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के नेतृत्व में चलने वाली सरकार को झटका लगा। शीला दीक्षित भी चुनाव हार गयी। मात्र 8 सीटें और 25% वोट मिले। परिणाम आने के बाद कांग्रेस ने भाजपा को रोकने की गलती समर्थन देकर केजरीवाल के नेतृत्व में सरकार बनवाई जो मात्र 49 दिनों तक चली। इसके एक साल बाद 14 फरवरी 2014 से 14 फरवरी 2015 तक राष्ट्रपति शासन रहा। 2015 में विधानसभा चुनाव हुए जिसमें केजरीवाल को अप्रत्याशित 54% मत मिले और 67 सीटो की सफलता रही। इसके पीछे यह माना गया कि 15 वर्षों तक कांग्रेस सत्ता में रही और केंद्र में भाजपा की सरकार होने के कारण राष्ट्रपति शासन को भाजपा का शासन मान लिया गया। दोनों कांग्रेस और भाजपा सरकार को जनता देख चुकी थी। भ्रष्टाचार के खिलाफ चेहरा बने केजरीवाल को इसी का लाभ मिला। केजरीवाल ने बड़े ही सुनियोजित तरीके से ईमानदारी से काम करने वाले, भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाले और राजनीति में स्वच्छता और शुचिता जैसे तमाम नारे देकर दिल्ली की जनता को आकर्षित किया था। 2015 चुनाव में भाजपा को मात्र 3 सीटें और 32% मत मिले और कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला। कांग्रेस का मत केजरीवाल के साथ जुड़ गया। 2015 में सरकार बनने के बाद केजरीवाल ने रेवड़ी की प्रथा शुरू की जिसमें 200 यूनिट फ्री बिजली, फ्री पानी, फ्री दवाई, फ्री पढाई प्रमुख रूप से शामिल थे।

यही नहीं केजरीवाल ने बहुत ही राजनीतिक होशियारी के साथ आप पार्टी से जुड़े बड़े-बड़े नाम जैसे प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, कुमार विश्वास सभी को अलग करने में सफलता भी हासिल की। ऐसे नए चेहरों को मैदान में उतारे जो केजरीवाल की लॉयल टीम के हिस्सा थे। सरकार बनने के बाद केजरीवाल ने मोदी के ही तर्ज पर पूरे देश में जोरदार प्रचार किया और छोटे से राज्य दिल्ली के खजाने से 500 करोड़ से अधिक धनराशि खर्च किया। इस प्रचार का लाभ यह हुआ कि आप पार्टी को दूसरे राज्यों में भी पहचान मिली। दूसरे राज्यों में संगठन बनाया और चुनाव भी लड़े। 2015 से 2020 तक केजरीवाल मोदी सरकार से अधिकारों को लेकर सीधी लड़ाई लड़ते रहे और देश में यह परसेप्शन बनाने में सफल रहे कि आप पार्टी, कांग्रेस का विकल्प बन सकती है। पंजाब, राजस्थान, हरियाणा और गुजरात सहित कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में आप का अच्छा प्रदर्शन रहा। दूसरी तरफ रेवड़ी के आधार पर गरीबों को जोड़कर 2020 में विधानसभा चुनाव में 62 सीटें जीती और मत प्रतिशत 2015 जैसा ही रहा। भाजपा की सीटें 3 से बढ़कर 8 हो गयी और मत प्रतिशत में 6% की बढ़ोतरी हुई। भाजपा का मत 32% से बढ़कर 38% हो गया। जबकि कांग्रेस को 5% का नुकसान हुआ और उसके मत 2015 की तुलना में 9% से घटकर 4% रह गए। कांग्रेस का इस बार भी खाता नहीं खुला लेकिन एक बात अहम् यह रही है कि विधानसभा चुनाव से लोकसभा चुनाव का परिणाम विपरीत रहा। भाजपा 2014, 2019, 2024 में 7 लोकसभा सीटों में कब्ज़ा बनाये रही। तमाम प्रयोग एवं प्रबंधन केजरीवाल का लोकसभा चुनाव में फेल रहा। मान लिया गया कि विधानसभा में केजरीवाल और लोकसभा में भाजपा रहेगी।

कांग्रेस हाशिये पर चली गई। 2015 और 2020 में अप्रत्याशित सफलता मिलने के बाद केजरीवाल का मनोबल बढ़ा और उनकी महत्वाकांक्षा कांग्रेस का विकल्प बनने के लिए तेजी से आगे बड़ी। क्योंकि केजरीवाल ने दिल्ली कांग्रेस से छीनी थी। गुजरात एवं अन्य राज्यों के चुनाव में आप पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया था। जिसका परिणाम यह रहा कि गुजरात में कांग्रेस का काफी नुकसान हुआ । पंजाब में दिल्ली की तर्ज पर तीन चौथाई से अधिक सीटें जीत कर कांग्रेस से सत्ता छीन ली और भगवंत मान को मुख्यमंत्री बनाया। केजरीवाल एक आईआरएस अधिकारी थे। निश्चित रूप से उनका प्रबधन, समझ सब कुछ अच्छा था इसलिए 10 वर्षों के अंतराल में नवगठित पार्टी ने राष्ट्रीय दर्जा भी हासिल कर लिया। निरंतर मिलती सफलताओं से केजरीवाल का मनोबल बढ़ा और उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कांग्रेस से आगे बढ़कर सीधा आक्रामक हमले का प्रयास शुरू किया और यह बताने का प्रयास किया कि आप पार्टी भाजपा को चुनौती दे सकती है। इसका लाभ भी केजरीवाल को मिला क्योंकि 2014 और 2019 में करारी शिकस्त के बाद कांग्रेस में निराशा और मनोबल गिरा हुआ था। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को 10% सीटें भी नहीं मिली जिससे उसे विपक्ष का दर्जा मिल सके। 2019 में चुनाव हारने के बाद राहुल गाँधी ने अध्यक्ष पद छोड़ दिया। तीन वर्षों तक कोई नियमित अध्यक्ष नहीं बन पाया और सोनिया गाँधी कार्यकारी अध्यक्ष रही। कांग्रेस पार्टी, राज्यों के चुनाव में भाजपा से हारती रही। पार्टी में अनिश्चितता और निराशा को देखते हुए लाभ लेने के लिए केजरीवाल ने मोदी पर सीधे हमले शुरू किये इसके बाद जैसा कि गैर भाजपा सरकारों के साथ होता है। केजरीवाल सरकार के साथ वही हुआ।

भ्रष्टाचार के मामले में जांच एजेंसियों ने छापे और जांच शुरू की और 100 करोड़ के शराब घोटाले में केजरीवाल, संजय सिंह, मनीष सिसोदिया सभी को जेल में भेज दिया गए। इसके अलावा कई विधायक और मंत्री भी भ्रष्टाचार के कारण जेल भेजे गए। केजरीवाल के जेल में जाने के बाद परसेप्शन बदला और मनोबल भी टूटा। दूसरी तरफ राहुल गांधी ने 2022-23 ने 9800 किलो मीटर की पूर्व से पश्चिम(कन्या कुमारी से कश्मीर) और मणिपुर से महाराष्ट्र तक यात्रा किया और जनता से रूबरू हुए एवं नई छवि बनाने में सफल रहे। 2022 से 2024 दो वर्षों में राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर राफेल, पेगासस, अडानी, नोटबंदी, किसान, बेरोजगारी, जातिगत जनगणना, संविधान को समाप्त करने जैसे तमाम मुद्दे उठाये जिसका लाभ भी कांग्रेस को मिला। चुनाव से पहले नितीश के प्रयास से इंडिया गठबधन बना और मोदी विरोधी दल राहुल के नेतृत्व में एकजुट हुए जिसमें केजरीवाल भी शामिल रहे। लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद इंडिया गठबंधन ने भाजपा को बहुमत से रोक दिया और मोदी को मात्र 240 सीटें मिली। लोकसभा चुनाव के थोड़े दिन पहले नितीश कुमार की महत्वाकांक्षा पूरी न होने के कारण वह भाजपा के साथ वापस चले और बिहार में आरजेडी से हटकर भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बने। इन चुनाव परिणामों के बाद भाजपा दवाब में थी लेकिन हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफलता ने भाजपा का मनोबल बढ़ा दिया।

दूसरी तरफ बदले हुए घटनाक्रम में विवादों से घिरे होने के कारण मुख्यमंत्री के रूप में कार्य नहीं कर पाएंगे। मजबूरी में केजरीवाल को इस्तीफ़ा देना पड़ा। अपना उत्तराधिकारी आतिशी को बनाया है। 2025 में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। इस बीच भाजपा और केजरीवाल दोनों चुनाव प्रबंधन में मास्टर माने जाते हैं। इनके बीच प्रतिस्पर्धा शुरू हो गयी है। मैक्रो बूथ प्रबंधन केजरीवाल और भाजपा दोनों बूथ मजबूत माना जाता है। इसीलिए बूथस्तर पर बनने वाले मतदाता सूची को लेकर संघर्ष शुरू है। केजरीवाल लगातार हर विधानसभा में आप समर्थकों के 20-20 हजार वोट काटने का खुला आरोप लगाते हुए मतदाताओं की सूची जारी कर रहे है। दूसरी तरफ भाजपा सूची से कटने वाले मतदाता को फर्जी बता रही है। दोनों जानते हैं कि असली लड़ाई बूथ प्रबंधन की है। इसलिए लड़ाई बूथ से शुरू है। किसका बूथ प्रबंधन मजबूत होगा वही चुनाव परिणाम तय करेगा।

दूसरा मुद्दा परसेप्शन का है। भाजपा यह परसेप्शन बना रही है कि केजरीवाल भ्रष्टाचारी है। शराब घोटाले में रिश्वत ली है। जो सादगी का वादा किया था वो ड्रामा था। करोड़ो रूपये आवास पर खर्च किया उसमें भी घोटाला किया। हर क्षेत्र में केजरीवाल को जनता के साथ धोखाधड़ी की है। फर्जी वादे किये है और पूरी सरकार भ्रष्टाचार में डूबी हुई है। इसी परसेप्शन के साथ एक पोस्टर जारी किया है कि “अब नहीं सहेंगे बदल के रहेंगे” यह भी सही है कि 10 वर्षों में जनता में ईमानदारी का परसेप्शन कमजोर हुआ है या नहीं। यह तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा। अरविन्द केजरीवाल इस परसेप्शन को बदलने का प्रयास कर रहे है। लगातार भाजपा पर भ्रष्टाचार, केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपोग, सरकार को काम न करने देने, उच्चतम न्यायालय के निर्णय राज्य सरकार को अधिकार देने को छीनने तथा निर्वाचन आयोग द्वारा भाजपा की मदद जैसे गंभीर आरोप लगा कर जनता के बीच पैदल जनसम्पर्क कर रहे है। जनसम्पर्क के दौरान हमले भी हुए। भाजपा इसको राजनीतिक लाभ लेना बता रही है। 2025 दिल्ली विधानसभा चुनाव केजरीवाल के लिए 2015 और 2020 जैसा आसान नहीं है। लेकिन भाजपा भी केजरीवाल के रेवड़ी कल्चर से गरीबों को मिलने वाले लाभ वाले मतदाताओं को कैसे अपने पक्ष में कर सकती है। यह भी भाजपा के चुनाव प्रबंधन और चाणक्य अमित शाह के लिए चुनौती है। स्थितियां दोनों तरह चुनाव प्रबंधन और परसेप्शन के आस-पास घूमती जा रही है। चुनाव में बूथ प्रबंधन किसका कितना बेहतर होगा और जनता के बीच परसेप्शन बनाने में कौन सफल होगा। यही 2025 विधानसभा चुनाव परिणाम में अहम है। परिणाम तय करेगा किसका भाजपा या केजरीवाल का बूथ प्रबंधन अच्छा रहा।