कर्नाटक में कांग्रेस की जीत से 2024 के राजनीतिक समीकरण बदले
दक्षिण भारत का मुख्य द्वार कहा जाने वाला कर्नाटक के चुनाव परिणाम ने 2024 के राजनीतिक समीकरण में बदलाव लाया है। कांग्रेस की जीत ने भाजपा के दक्षिण भारत का प्रवेश द्वार दहा दिया। भाजपा जिस उत्साह के साथ कर्नाटक में जीत हासिल करना चाहती थी वह सारी तैयारियां धवस्त हो गयी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बजरंगबली कार्ड, रोड शो अमित शाह का बूथ प्रबंधन सभी कुछ फेल हो गया। कांग्रेस 135 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत की सरकार बनाई। यही नहीं विपक्ष के जो राजनीतिक दल ममता, केजरीवाल, चंद्रशेखर राव एवं अखिलेश को कांग्रेस के प्रति अपने नजरिये में बदलाव लाना पड़ा। यह चारों दल गैर कांग्रेस मोर्चे के बारे में चर्चा कर रहे थे। कर्नाटक परिणाम ने इन सभी दलों को सोच में बदलाव लाने के लिए मजबूर कर दिया। कांग्रेस में उत्साह के साथ साथ आर्थिक प्रबंधन का भी बहुत बड़ा स्रोतकर्नाटक की जीत से हासिल हो गया। आने वाले दिनों में पांच राज्यों छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, मिजोरम जहाँ 2023 में चुनाव होने जा रहे हैं कांग्रेस कर्नाटक की तरह आक्रामकता के साथ चुनाव में जाने की तैयारी कर रही है। कर्नाटक राज्य बहुत महत्वपूर्ण है इसकी सीमायें तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गोवा, केरल और तमिलनाडु से मिलती है। इन सीमावर्ती क्षेत्रों में कोस्टल कर्नाटक जो हिंदुत्व की प्रयोगशाला माना जाता है को छोड़ दे तो सभी क्षेत्रों में कांग्रेस को बढ़त मिली है। 2018 में 80 सीटें कांग्रेस जीती थी जो 2023 में बढ़कर 135 हो गयी। जबकि भाजपा 104 से घटकर 66 रह गयी। राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा, वोक्कालिंगा में शिव कुमार का नए नेता के रूप उभारना, मुस्लिम ध्रुवीकरण ने जेडीएस को नुकसान पंहुचा। उसकी सीटें 37 से घट कर 19 रह गयी। कर्नाटक चुनाव से यह भी साबित हो गया है कि प्रभानमंत्री नरेन्द्र मोदी विधानसभा चुनाव में उन्ही राज्यों में फायदा दिला सकते है जिन राज्यों में भाजपा की स्थानीय नेतृत्व शसक्त और आपसी तालमेल के साथ चुनाव लड़ रहा है। कर्नाटक में मोदी का चेहरा ज्यादा प्रभावी इसलिए नहीं हो पाया क्योकि राज्य की इकाई बहुत कमजोर थी। भाजपा सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर थी। जबकि कांग्रेस स्थानीय इकाई आपसी तालमेल के साथ मजबूती के साथ रही थी।





