राजनीति के इतिहास में साल 1977 लोकतंत्र के लचीलेपन और मानवीय भावना की विजय का एक मार्मिक प्रमाण है. यह वह समय था जब राष्ट्र अत्याचार और स्वतंत्रता के चौराहे पर खड़ा था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल लगा दिया था। आपातकाल की घोषणा ने भारतीय लोकतंत्र के ताने-बाने में उथल-पुथल मचा दी थी। लोग इसे निरंकुश शासन और क्रूर दमन के युग की शुरुआत बता रहे थे। मोरारजी देसाई और जयप्रकाश नारायण सहित प्रमुख विपक्षी नेताओं को जेल की कोठरियों में डाल दिया गया था। हालांकि, उनकी आवाजें भले ही खामोश कर दी गईं हों, लेकिन उनकी आत्माएं अटूट रहीं।
दो सालों तक देश के नागरिकों की आजादी को कुचल दिया गया था। असहमति की सभी आवाजों को दबा दिया जा रहा था। प्रेस की स्वतंत्रता भी छीन ली गई थी। लेकिन मार्च 1977 में आपातकाल हटा दिया गया। इस दौरान भारत अपनी लोकतांत्रिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा था। नए चुनावों के लिए इंदिरा गांधी के आह्वान ने राजनीतिक जागृति की एक नई सुबह की शुरुआत की। अब राष्ट्र अपने भाग्य को चुनने के अपने संप्रभु अधिकार का प्रयोग करने के लिए तैयार था।
चुनावी राजनीति की उथल-पुथल के बीच, एक गठबंधन उभरा, जो एक सामान्य लक्ष्य से एकजुट था। लोकतंत्र को बहाल करना और जवाबदेह शासन के युग की शुरुआत करना. जनता पार्टी, अलग-अलग राजनीतिक ताकतों का एक गठबंधन था। इसमें मोरारजी देसाई और चरण सिंह जैसे नेता शामिल थे। प्रचार अभियान “इंदिरा हटाओ देश बचाओ” के जोरदार नारे से गूंज उठा। जनता पार्टी ने सत्तावादी शासन के खिलाफ जनता को एकजुट कर लिया था। जनता पार्टी लगातार मतदाताओं के साथ तालमेल बिठा रही थी।
जैसे-जैसे चुनावी लड़ाई अपने चरम पर पहुंची, मतपेटी के फैसले की गूंज पूरे देश में सुनाई देने लगी। जनता ने कांग्रेस को सिरे से खारिज कर दिया था. जनता पार्टी विजयी हुई और सत्ता के एकाधिकार को खत्म कर दिया। आजादी के बाद ऐसा पहली बार था जब कांग्रेस ने लोकसभा में अपना बहुमत खो दिया था। 41.32 प्रतिशत वोट शेयर के साथ, जनता पार्टी ने जीत हासिल की और 405 सीटों में से 295 सीटों पर विजयी हुई। कुल 542 सीटों में से जनता पार्टी और उसकी सहयोगी पार्टियों ने 330 सीटें अपने नाम की। वहीं, कांग्रेस पार्टी ने 492 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन 34.52 वोट शेयर के साथ केवल 154 सीटें जीतीं।
आखिरकार, मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हुए, जो भारत के राजनीतिक विकास में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुआ। मोरारजी देसाई ने 24 मार्च, 1977 को पद की शपथ ली और लाखों लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने की यात्रा पर निकल पड़े। जनता पार्टी की जीत सिर्फ लोकतंत्र की जीत नहीं थी। यह भारतीय लोगों की अदम्य भावना का प्रमाण था, जिन्होंने उत्पीड़न की ताकतों से डरने से इनकार कर दिया था। आजादी के बाद पहली बार, राष्ट्र एक गैर-कांग्रेसी सरकार के उदय का गवाह बना, निरंकुशता पर लोकतंत्र की विजय का प्रतीक थी।
इंदिरा के फैसले से अचंभित था विपक्ष
1977 लोकसभा चुनाव का कार्यकाल नवंबर महीने में समाप्त होने वाला था लेकिन, इंदिरा गांधी ने 18 जनवरी को ही चुनाव की घोषणा करके विपक्ष को अचंभित कर दिया। इंदिरा को लगा कि विपक्ष को तैयारी का मौका नहीं मिलेगा और इसका फायदा उन्हें ही मिलेगा। लेकिन, ऐसा नहीं हो सका। उस वक्त विपक्ष के बड़े नेता चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेई और चंद्रशेखर को लग रहा था कि इंदिरा गांधी विपक्ष को तोड़ने की कोशिश कर रही है, मनोबल गिरा रही है।
1977 लोकसभा चुनाव में जनता दल ने 542 में से 296 सीटों पर जीत दर्ज की थी। जबकि इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस पार्टी को 154 सीट मिल पाईं। कांग्रेस को इस चुनाव में 198 सीटों का नुकसान हुआ। यह इंदिरा के लिए बड़ी हार थी, जिसकी उन्होंने बिल्कुल भी अपेक्षा नहीं की थी।
इंदिरा ने झोंक दी थी पूरी ताकत
इंदिरा गांधी अपनी जीत को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त थीं। उन्होंने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए भी कोई कसर नहीं छोड़ी। इंदिरा गांधी ने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान 40 हज़ार किलोमीटर की यात्रा की। जम्मू कश्मीर और सिक्किम को छोड़कर वो हर राज्य में गईं और 244 चुनाव सभाओं को संबोधित किया।
संसद में आपातकाल का प्रस्ताव रखने वाला नेता इंदिरा से अलग
नए दल के गठन के 10 दिन बाद ही कांग्रेस को एक बहुत बड़ा झटका लगता है। 1975 में जिस नेता ने संसद में आपातकाल का प्रस्ताव रखा था वही नेता इंदिरा का साथ छोड़ देता है। वो नेता बाबू जगजीवन राम हैं। जगजीवन राम का इस्तीफा आने वाले तूफान का संकेत दे जाता है। उस दौर में दलितों के सबसे बड़े नेता का कांग्रेस से नाता तोड़ना इंदिरा के लिए एक बहुत बड़ा झटका था। कांग्रेस से इस्तीफे के बाद जगजीवन राम अपना दल बनाते हैं। फरवरी 1977 में उनकी नई पार्टी कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी अस्तिव में आती है। जगजीवन राम का साथ देते हैं हेमवती नंनद बहुगुणा, नंदिनी सत्पथी और राजमंगल जैसे कद्दावर नेता। कांग्रेस विरोधी मतों का विभाजन रोकने के लिए जगजीवन राम की पार्टी और जनता पार्टी में भी गठबंधन हो जाता है।
रामलीला मैदान में विपक्ष की रैली
6 मार्च 1977, दिन रविवार, विपक्ष रामलीला मैदान में एक विशाल रैली का आयोजन करता है। ये रैली विपक्ष के चुनाव अभियान की शुरुआत थी। उस वक्त देश में सिर्फ एक टीवी चैनल होता था, ये चैनल सरकारी नियंत्रण में था। जिस वक्त रामलीला मैदान में रैली हो रही थी। उस वक्त टीवी पर उस समय की सुपरहिट फिल्म बॉबी दिखाई जा रही थी। कहा जाता है कि ऐसा इसलिए किया गया जिससे जनता टीवी पर चिपकी रहे और विपक्ष की रैली विफल हो जाए। इसके बाद भी बॉबी पर बाबू और जेपी भारी पड़े। रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण को सुनने लाखों लोग पहुंचे। रैली में विपक्ष के कई नेताओं ने भाग लिया। ठीक उसी दिन इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और जयप्रकाश नारायण का साक्षात्कार छपा। इस साक्षात्कार में इंदिरा ने कहा कि जनता पार्टी के लोग किसी सकारात्मक योजना के साथ एक मंच पर नहीं आए हैं, ये सभी अपने पुराने उद्देश्य इंदिरा हटाओ ले लिए एकजुट हुए हैं। इसमें कुछ भी नया नहीं है।
जेपी अपनी रैलियों में आपातकाल की याद दिलाते
चुनाव प्रचार शुरू हुआ। एक तरफ इंदिरा चुनाव प्रचार का चेहरा थीं तो दूसरी ओर जयप्रकाश नारायण। बढ़ती उम्र, गिरते स्वास्थ्य की परवाह किए बिना जयप्रकाश देश भर में रैलियां कर रहे थे। सिर्फ डायलिसिस करवाने के लिए ही जयप्रकाश चुनाव प्रचार से ब्रेक लेते थे। अपनी रैलियों में वो आपातकाल की यातनाओं की याद दिलाते, जनता से कहते कि अगर कांग्रेस वापस आती है, तो पिछले 19 महीने का आतंक अगले 19 साल की यातना बन जाएगा। जबरन नसबंदी को फिर से लागू किया जाएगा। विपक्ष यह प्रचार करने में लगा था कि कांग्रेस अब वो कांग्रेस नहीं रही बल्कि ये इंदिरा के परिवार की जागीर बन चुकी है। दूसरी तरफ इंदिरा अपनी रैलियों में इन आरोपों का खंडन करतीं। अपने परिवार के त्याग और सेवा की लोगों को याद दिलातीं।
जेपी आंदोलन से नए नेताओं का उदय
1974 में पटना के गांधी मैदान में जय प्रकाश नारायण ने एक बड़ी जनसभा की और ‘संपूर्ण क्रांति’ की घोषणा की। आपातकाल के विरोध में यह आंदोलन चलाया गया था। जेपी ने इस आंदोलन के लिए एक साल तक विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को बंद करने का आह्वान किया। जेपी आंदोलन से जुड़े लोगों को जेल जाना पड़ा। जेपी आंदोलन से ही कई दिग्गज नेता निकले। इनमें जॉर्ज फर्नांडिज, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुशील मोदी और शरद यादव शामिल हैं।
उत्तर भारत में कांग्रेस का सूपड़ा साफ
आपातकाल और उस दौरान चलाए गए जबरन नसबंदी के अभियान ने उत्तर भारत में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। बिहार और उत्तरप्रदेश जैसे दो मुख्य राज्यों में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी। वहीं अन्य हिंदी भाषी राज्य जैसे राजस्थान और मध्यप्रदेश में कांग्रेस को सिर्फ एक-एक सीट मिली। राजधानी दिल्ली में भी कांग्रेस खाता नहीं खोल पाई थी।

अपनी सीट तक नहीं बचा पाईं इंदिरा
इंदिरा गांधी ने 1977 के जनवरी माह में लोकसभा भंग कर आम चुनाव की घोषणा की। इसके बाद 16 से 19 मार्च तक वोटिंग हुई और 20 मार्च को वोटों की गिनती शुरू हुई। जिसमें 542 सीटों में से कांग्रेस को सिर्फ 154 सीटों से संतोष करना पड़ा। इस तरह कांग्रेस को करीब 200 सीटों का नुकसान हुआ था। वहीं जनता पार्टी ने 295 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस चुनाव में इंदिरा (रायबरेली) और उनके बेटे संजय गांधी भी हार गए थे।
शाह आयोग का गठन, दो बार गिरफ्तार हुईं इंदिरा
आपातकाल के दौरान इंदिरा सरकार ने लोगों के अधिकारों का कैसे-कैसे हनन किया इसकी जांच के लिए जनता पार्टी ने शाह आयोग का गठन किया। इसके साथ ही अपनी शक्ति के गलत इस्तेमाल के लिए इंदिरा को नाटकीय ढंग से दो बार अरेस्ट भी किया गया। जिसमें वह पहली बार एक दिन और दूसरी बार करीब एक हफ्ते के लिए जेल में रहीं।
मोरारजी कैसे बने पीएम
1977 चुनाव की घोषणा इंदिरा गांधी ने महीनों पहले ही कर दी थी, इससे विपक्ष को ज्यादा मौका नहीं मिला। इस मामले के जानकार मानते हैं कि इंदिरा गांधी चाहती भी यहीं थीं। लेकिन, जनता ने इंदिरा गांधी से सत्ता की चाबी जनता दल के हाथ में थमा दी। 20 मार्च को चुनाव के नतीजे सामने आ चुके थे और जनता दल चुनाव जीत चुकी थी। अब सवाल था पीएम के चुनाव का। यह बेहद रोचक है कि चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेई और चंद्रशेखर जैसे दिग्गज नेताओं को पछाड़कर 81 साल के मोरारजी देसाई को सर्वसम्मति से पीएम बनाया गया। हालांकि उनकी सरकार ज्यादा नहीं चली और तीन साल बाद 1980 में फिर चुनाव कराने पड़े।
अपनी सीट भी नहीं बच पाई
इंदिरा गांधी को 1977 के लोकसभा चुनाव में इस कदर बुरी हार का सामना करना पड़ा कि वो अपनी परंपरागत सीट रायबरेली भी नहीं बचा सकी। इस सीट पर उन्हें जनता दल के बड़े राजनेता और ‘जायंट किलर’ के नाम से मशहूर राज नारायण ने हराया था। इंदिरा गांधी 55 हजार से भी ज्यादा मतों के अंतर से अपनी सीट हारी। राज नारायण के बारे में कहा जाता था कि अगर वो राजनेता न बनते तो पहलवान जरूर होते। उन्हें पहलवानी का हुआ करता शौक था।
ब्लॉकबस्टर फिल्म बॉबी
बताया जाता है कि इंदिरा गांधी की पार्टी के दिग्गज नेता जगजीवन राम और हेमवती नंदन बहुगुणा के इस्तीफ़े के बाद विपक्ष उत्साहित था। विपक्ष ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक ज़बरदस्त रैली का आयोजन किया। कहा जाता है कि इसमें इतना जनसैलाब उमड़ा, जिसकी विपक्ष ने भी उम्मीद नहीं की थी। इस रैली को रोकने के लिए तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने इंदिरा के कहने पर 1973 की ब्लॉकबस्टर फिल्म बॉबी को दूरदर्शन पर चलाने का फैसला लिया। हालांकि यह ट्रिक भी काम नहीं आई। लोग कई किलोमीटर पैदल चलकर विपक्ष की रैली में पहुंचे थे।
नाटकीय राजनीतिक घटनाक्रम के बाद 1980 में हुए चुनाव
दूसरी तरफ संजय गांधी किसी तरह जनता पार्टी की सरकार गिराने का जुगाड़ लगा रहे थे। इसे ध्यान में रखते हुए उन्होंने राज नारायण को मना लिया कि वह भारतीय लोक दल का समर्थन जनता पार्टी सरकार से वापस ले लें। संजय ने वादा किया था कि कांग्रेस चरण सिंह को प्रधानमंत्री बनने में मदद करेगी। इसपर राज नारायण राजी हो गए। फिर मोरारजी देसाई के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। जनता पार्टी की सरकार गिराई गई। वादे के मुताबिक, चरण सिंह पीएम भी बने लेकिन सिर्फ 23 दिन के लिए। इसके बाद इंदिरा ने उनसे समर्थन वापस ले लिया और फिर 1980 में चुनाव की घोषणा हो गई। इसके साथ ही चरण सिंह इकलौते ऐसे भारतीय प्रधानमंत्री बन गए, जिनकी सरकार संसद में कदम रखने से पहले ही गिर गई।







